संघ के 100 साल: केरल में संघ स्वयंसेवकों का सबसे ज्यादा खून बहा, जानिए RSS की ‘द केरला स्टोरी’

संघ के 100 साल: केरल में संघ स्वयंसेवकों का सबसे ज्यादा खून बहा, जानिए RSS की ‘द केरला स्टोरी’


एक बार जब गुरु गोलवलकर केरल की यात्रा पर थे, कुछ किशोर स्वयंसेवकों ने उनकी उपस्थिति में एक खेल खेला. बाद में  उन्होंने एक स्वयंसेवक से पूछा, ‘इस खेल का नाम क्या है?’ लड़के ने जवाब दिया, ‘दीपक बुझाना’. इस पर गुरु गोलवलकर ने एक बड़े स्वयंसेवक से पूछा, ‘क्या लड़के ने सही नाम बताया?’ जब उसने हां में उत्तर दिया, तो गुरु गोलवलकर ने कहा,  ‘’किसी भी खेल का नाम ऐसा नहीं होना चाहिए. हमारी संस्कृति में दीपक बुझाना अशुभ माना जाता है. यहां हम कहते हैं कि ज्ञान का दीपक चमकता रहे. खेलों में भी नाम ऐसे होने चाहिए जो अच्छे संस्कार पैदा करें,’’ बेझिझक कहा जा सकता है कि अगले ही दिन खेल का नाम बदलकर ‘चैलेंज या चुनौती’ कर दिया गया. लेकिन गुरु गोलवलकर के ये तेवर बताते हैं कि संघ के केरल में विस्तार को लेकर उनका रुख क्या था और क्यों संघ ने केरल में ही सबसे ज्यादा प्रचारकों-स्वयंसेवकों का खून बहाया. गुरु गोलवलकर समझ चुके थे कि विदेशी भाषा, विचार हो या सम्प्रदाय, असर सोच, संस्कारों और संस्कृति पर पड़ती है.  उस वक्त हालात ऐसे थे कि अगर कोई हिंदू किसी चाय की दुकान पर बैठकर अगर चाय पी रहा होता था, तो ईसाई या मुसलमान के आने पर उसे उठना पड़ता था. 1905 में ही ईसाइयों ने केरल में 105 मंदिर तोड़े थे.
 
दत्तोपंत ठेंगड़ी ने रखी नींव

केरल में सबसे पहले जिस प्रचारक के पांव पड़े थे, वो थे दत्तोपंत ठेंगड़ी. बचपन से ही नागपुर में दत्तोपंत संघ की शाखा में भी जाया करते थे. ऐसे में मोरोपंत पिंगले उनके सहपाठी थे और शाखा के मुख्य शिक्षक भी, सो उनके सानिध्य में रहते रहते संघ के तीनों शिक्षा वर्ग भी कर लिए. उनको डॉ हेडगेवार से भी मिलने, बात करने का इस दौरान अवसर मिला.  जब 1942 में गुरु गोलवलकर ने युवाओं से आव्हान किया कि संघ को कुछ साल दें, प्रचारक बनकर निकलें, तो असर दत्तोपंत ठेंगडी पर भी पड़ा. उनको 22 मार्च 1942 को केरल में कालीकट (कोझिकोड) का प्रचारक बनकर भेज दिया गया. वहां के राजपरिवार का सहयोग मिला और उन्होंने चलप्पुरम में पहली शाखा स्थापित की.

तीन साल में उन्होंने संघ का काफी कार्य उस दुर्गम क्षेत्र में खड़ा कर दिया, तो 1945 में उन्हें वहां से कलकत्ता भेज दिया गया. उनका काम देखकर 1948 में उन्हें बंगाल के साथ साथ असम प्रांत का प्रचारक भी बना दिया गया. ये वो दौर था, जब गांधी हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. ऐसे में दत्तोपंत को भी वापस आना पड़ा था. बाद में इन्हीं दत्तोपंत ठेंगड़ी ने मजदूर संघ, स्वदेशी जागरण मंच, अधिवक्ता परिषद जैसे कई संगठन संघ के अंदर खड़े कर दिए. एक बार 82 साल की उम्र में 2002 में वे किसी बैठक में भाग लेने फिर कालीकट (कोझिकोड) आए. केरल के स्वयंसेवकों में बड़ा उत्साह था, दो युवा स्वयंसेवक उनसे मिलने को आतुर थे. आखिर केरल में संघ की नींव रखने वाले महामानव का दर्शन ही उनके लिए विरला था.

भारतीय मजदूर संघ के क्षेत्रीय संगठन मंत्री सीवी राजेश लिखते हैं, “सुबह-सुबह वे कार्यालय की ऊपरी मंज़िल के बड़े हाल में टहल रहे थे. स्वयंसेवकों ने सोचा कि उनकी चाल में बाधा न बने, इसलिए वे चुपचाप प्रतीक्षा करते रहे. ठेंगड़ी जी ने उनकी ओर देखा. तब वे साहस जुटाकर आगे बढ़े और ‘नमस्ते’ कहा. ठेंगड़ी जी ने भी मुस्कुराते हुए ‘नमस्ते’ कहा. वे स्वयंसेवक अपनी जानी-पहचानी गैर-मलयालम भाषा में शीघ्रता से अपना परिचय देने लगे. ठेंगड़ी जी ने कोई उत्तर नहीं दिया, चलना रोक दिया और हॉल से अपने कमरे में चले गए. इस अप्रत्याशित घटना से स्वयंसेवक उदास हो गए. उन्होंने एक-दूसरे की ओर देखा और मन ही मन सोचा, ‘शायद उन्हें अच्छा नहीं लगा कि हमने उनके टहलने के बीच में जाकर परिचय कराया…’ लेकिन यह विचार मन से निकला ही नहीं था कि ठेंगड़ी जी कमरे से बाहर आते दिखाई दिए — दोनों हाथों में एक-एक फाइबर की कुर्सी उठाए हुए. स्वयंसेवक अपनी गलती पर लज्जित होकर तुरंत आगे बढ़े और कुर्सी लेने की कोशिश की, पर उन्होंने देने से मना कर दिया. वहां रखी एक कुर्सी के पास उन दो कुर्सियों को रखकर उन्होंने स्वयंसेवकों को बैठने का आग्रह किया. लगभग 20 वर्ष के उन युवा कार्यकर्ताओं से बात करने के लिए 82 वर्ष के उस वृद्ध प्रचारक ने स्वयं कुर्सियाँ उठाकर लाना उचित समझा”. ऐसे थे ठेंगड़ी जी.
 
रंगून में जन्मे भास्कर अन्ना ने खड़ी की शाखाओं की श्रृंखला

शुरूआत में केरल में शाखाओं के विस्तार का सबसे ज्यादा श्रेय दिया जाता है रंगून (म्यांमार) के पास टिनसा नगर में 1919 में जन्मे भास्कर राव कलंबी को. उनके पिता शिवराम कलंबी वहां चिकित्सक थे, सो उनकी शुरूआती शिक्षा भी वहीं हुई थी. पिता बम्बई (अब मुम्बई) आए तो भास्कर भी साथ आए. वहां उनकी मुलाकात बम्बई के प्रथम प्रचारण गोपालराव येरकुंटवार से हुई. ये 1935 की बात है, भास्कर वहां शिवाजी उद्यान शाखा में जाने लगे. डॉ हेडगेवार बम्बई आए तो भास्कर उनसे ज्यादा से ज्यादा बात करते थे, उनकी सेवा करते थे. डॉ हेडगेवार का ऐसा प्रभाव भास्कर पर पड़ा कि 1940 तक वो तीसरा संघ शिक्षा वर्ग कर चुके थे. उसी साल डॉ हेडगेवार का अंतिम बौद्धिक हुआ था. हालांकि प्रचारक वे पढ़ाई पूरी करने के बाद ही बने, तब तक बम्बई नगर में एक विभाग के कार्यवाह रहे, लेकिन जैसे ही 1945 में वकालत की परीक्षा पास की, उन्हें प्रचारक बना दिया गया और जिम्मेदारी दी गई केरल में कोच्चि की.

सबसे पहले उन्होंने खुद को केरल के रंग में ढाला, कोई उन्हें देखकर अनुमान नहीं लगा सकता था कि वो मलयाली नहीं है. 1964 में जब केरल अलग प्रांत बना तो उनको उसके पहले प्रांत प्रचारक की जिम्मेदारी दी गई. 1982 तक केरल ही उनका कार्यक्षेत्र रहा. उन्हें बखूबी पता था कि ईसाई और मुस्लिम कट्टर गुट संघ के काम को आसानी से यहां खड़ा नहीं होने देंगे, लेकिन वो बाधाओं के आगे हार मानने वालों में से नहीं थे. शुरूआत उन्होंने केरल के निर्धन मछुआरों की बस्तियों में रात्रि शाखाएं लगाने से की. उनमें लगातार बढ़ती संख्या को देखकर कम्युनिस्ट परेशान होने लगे और फिर शाखाओं पर हमला होना, हिंसक घटनाएं होना और अक्सर स्वयंसेवकों का जान गंवा देना.. धीरे धीरे आम हो गया.

लेकिन भास्कर को सब लोग अन्ना कहते थे, उनका साथ छोड़ने को तैयार नहीं थे. धीरे धीरे गरीब किसान मजदूरों के साथ अनुसूचित जाति जनजाति के लोग, छोटे कारीगर आदि शाखां में बढ़ने लगे, वही अब हमला बोलने वालों से लोहा लेने लगे थे. बाद में संघ के बाकी संगठनों की नींव भी वहीं रखी गई और संघ एक ताकत के रूप में केरल में उभरने लगा. भास्कर केरल अपनी मर्जी से तो कभी छोड़ते भी नहीं, लेकिन 1981 में एक संघ शिक्षा वर्ग के दौरान उनको दिल का दौरा पड़ा, 1983 में उनको फिर से दिक्कत हुई तो बायपास सर्जरी करवानी पड़ी. उन्हें महीनों तक अपने कार्य से दूर रहना प़ड़ा, जब वापस भी आए तो कम तनाव वाला बनवासी कल्याण आश्रम का दायित्व दे दिया गया. 1996 में उन्होंने संघ के सभी दायित्वों से मुक्ति ले ली और मुंबई चले आए, जब लगा कि अब स्वास्थ्य साथ नहीं देगा तो फिर संघ से आग्रह करके अपनी कर्मभूमि कोच्चि आ गए. वहीं 2002 में संघ कार्यालय पर 12 जनवरी को अपनी अंतिम सांस ली.
 
मलयाली पी परमेश्वरन को थी सनातनी संस्कृति की चिंता

लेकिन जाने से पहले वो केरल में संघ शाखाओं का जाल बिछाकर गए थे औऱ ढेरों साहसी ऊर्जावान कार्यकर्ता भी खड़े कर गए थे. उन्हीं में से एक थे, पी परमेश्वरन. जब 23 साल के थे, तभी संघ से जुड़ गए थे. परमेश्वरन केरल के ही अलुप्पुझा जिले के मुहम्मा के रहने वाले थे, 1950 में संघ से जुड़े थे. 1957 में उन्हें जनसंघ में भेजा गया, पहले राज्य स्तर पर काम किया, फिर राष्टीय दायित्व मिला. 1986 में परमेश्वर जनसंघ के अखिल भारतीय महासचिव और बाद में उसके राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए गए थे. 1982 तक वो दिल्ली में दीनदयाल उपाध्याय शोध संस्थान के निदेशक के तौर पर भी काम करते रहे थे. फिर उन्हें लगा कि उन्हें गृह राज्य में काम करना चाहिए.

केरल में उन्होंने एक नए संगठन भारतीय विचार केन्द्रम को सुव्यवस्थित आकार देने का निश्चय किया. आपातकाल में 16 महीने जेल में गुजारने पड़े थे. पी परमेश्वरन ने कन्या कुमारी के विवेकानंद केन्द्र की जिम्मेदारी भी संभाली. केरल की समस्या वही थी जो गुरु गोलवलकर ने उनके एक खेल के नाम से ही जान ली थी, सनातन संस्कृति धीरे धीरे क्षरण होना. इसी दिशा में सबसे ज्यादा काम परमेश्वरन ने किया. मलयालम और अंग्रेजी में 20 से अधिक किताबें लिखीं, जिनमें प्रमुख थीं नारायण गुरु द पैगम्बर ऑफ रेनसां. भागवत गीता एक नई विश्व व्यवस्था का दृष्टिकोण और हार्टबीट ऑफ हिंदू नेशन आदि. स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण के 100 साल पूरा होने पर परमेश्वरन ने एक भव्य आयोजन किया था. 2000 में उन्हें पदमश्री और 2018 में उन्हें पदमविभूषण मिल चुका है, 2 साल बाद वो गोलोक चले गए. 
 
राजपरिवार के पी माधव जब असली ‘माधव’ से मिले तो संघ के ही होकर रह गए

दत्तोपंत ठेंगड़ी ने कालीकट (कोझिकोड) में जो पहली शाखा शुरू की थी, उसी शाखा में से केरल में संघ को दिशा देने वाला एक और प्रचारक निकला था, नाम था पी माधव. दरअसल पी माधव कोझिकोड के ही राज परिवार से ही जुड़े थे, इस शाखा को राजपरिवार की सहायता से ही शुरू किया गया था. उनके पिता श्री विक्रमन राजा वकील थे, लोग सम्मान से उन्हें कुन्मुणि राजा कहते थे. उनका मां का नाम सावित्री था, दोनों की कुल 8 संतानें थी और बड़ा बेटा मानो उन्होंने संघ के नाम ही कर दिया था. कैमिस्ट्री से बीएससी की पढ़ाई करने माधव चेन्नई चले गए थे, वहां उनका परिचय दादाराव परमार्थ से हुआ था.

एक बार जब असली माधव यानी माधव सदाशिवराव गोलवलकर चेन्नई आए तो पी माधव से भी मिले, माधव को ही गुरु गोलवलकर की सेवा में रखा गया था. अगर ये मुलाकात ना होती, गुरु गोलवलकर से उनकी कई मुद्दों पर देर तक गंभीर बातचीत ना होती, तो संघ को पी माधव जैसा जुझारू प्रचारक नहीं मिलता. गुरु गोलवलकर से मिलने के बाद उन्होंने संघ में प्रचारक बनने का निश्चय किया और 1947-48 में उन्हें कन्नूर (केरल) जिले के तलसेरि में भेज दिया गया था. उसी दौरान गांधीजी की हत्या हो गई, वैसे ही माहौल ईसाई, मुस्लिम बाहुल्य था, ऐसे में माधव ने काफी कठिन समय काटा था. मल्लापुरम में हिंदुओं का नरसंहार हुआ और शबरीमाला अयप्पा मंदिर को जला दिया गया था.
 
पी माधव हार मानने वाले नहीं थे, वो संघर्ष करते रहे, प्रतिबंध तोड़ने पर जेल भेज दिए गए. जेल से वापस आए तो उनको 1950 में त्रावणकोर भेजा गया, वहां उन्होंने एक भव्य आयोजन किया, जिसको नाम दिया गया ‘हिंदू महामंडलम’.  पी माधव को जिला औऱ विभाग प्रचारक के पदों पर काम करने के बाद केरल के प्रथम प्रांत बौद्धिक प्रमुख की जिम्मेदारी दी गई. मंदिरों के संरक्षण की तरफ उनका खासा ध्यान था. मंदिरों की देखभाल के लिए उन्होंने ‘केरल क्षेत्र संरक्षण समिति’ का गठन किया और पुजारियों के प्रशिक्षण के लिए ‘तंत्रविद्या पीठम’ भी स्थापित की. ये साफ था कि सनातन परम्पराएं ही केरल को मूल स्वरूप में वापस ला सकती हैं. इसके लिए हिंदुओं के बीच से जातिगत भेदभाव मिटाने का बीड़ा भी उन्होंने उठाया, केरल के वरिष्ठ पुजारियों, विद्वानों, आचार्यों को एक सम्मेलन में इकट्ठा कर उनसे मंदिरों में सभी जातियों के हिंदुओं को निर्बाध प्रवेश मिले, ऐसा प्रस्ताव पारित करवाया.

उनका ध्येय था कि शाखाओं की तरह मंदिरों को भी संस्कार प्रदान करने वाले सबल केन्द्र की तरह काम करना चाहिए. 1982 में जो केरल में विशाल हिंदू सम्मेलन हुआ, उसके पीछे पी माधव ही थे. उन्होंने संस्कृत के छात्रों को और आचार्यों के लिए ‘क्षेत्र चैतन्य रहस्य’ नामक प्रसिद्ध किताब लिखी. गुरु गोलवलकर की तरह ही ब्रह्मकपाल में अपना श्राद्ध किया था. करण सिंह जैसे नामचीनों की उपस्थिति में आयोजित 1981 के हिंदू सम्मेलन में मलयालम पंचांग के अंतिम माह कर्कटकम को ‘रामायण माह’ के रूप में मनाने का आह्वान किया गया था और सभी हिंदुओं से महाकाव्य के श्लोकों का पाठ करने का आग्रह किया गया था. समय के साथ, यह प्रथा आरएसएस की सदस्यता से परे जाकर केरल के हिंदुओं के बीच एक व्यापक सांस्कृतिक पहचान बन गई है. आरएसएस नेताओं का तर्क है कि इस प्रकार की पहल केरल के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने में अपनी वैचारिक दृष्टि को समाहित करने की संगठन की दीर्घकालिक रणनीति को दर्शाती है.  

एस सेतुमाधवन और के पी राधाकृष्ण जैसे वरिष्ठ संघ स्वयंसेवक भी हैं, जिनकी वजह से आज केरल में संघ इतने जोश से लड़ाई लड़ रहा है कि असर स्थानीय चुनावों में देखने को मिला जब राजधानी तिरुवनंतुपुरम में बीजेपी को अपना पहली बार मेयर बनाने का मौका मिल गया. एस. सेथुमाधवन तिरुवनंतपुरम में रहने वाले प्रथम पीढ़ी के प्रचारक,  सह-प्रांत प्रचारक जैसे वरिष्ठ पदों पर रहे. कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा के 1962 में अनावरण जैसी महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़े रहे सीपीएम नेताओं के साथ संवाद में भाग लिया.
 
गुरु गोलवलकर की सभा पर हमला ही था केरल में संघ के खिलाफ हिंसा की शुरूआत

1948 में तिरुवनंतपुरम में ये हमला हुआ था. अविभाजित सीपीआई ने गोलवलकर द्वारा संबोधित आरएसएस की सभा पर हमला किया था. स्वयंसेवकों ने जवाबी कार्रवाई की, लेकिन कार्यक्रम जारी रहा,  इसने शुरुआती राजनीतिक तनाव को सतह पर लाकर बता दिया था कि आगे किस तरह की हिंसा होने वाली है. फिर 1950 में हुई सबरीमाला मंदिर में आगजनी, मंदिर को आग लगाकर नष्ट कर दिया गया, जिसके कारण हिंदू समूहों को एकजुट करने के लिए हिंदू ऐक्य मंडल का गठन हुआ, हालांकि कांग्रेस की राजनीति और जातिगत मुद्दों ने इसे कमजोर कर दिया.

1969 के थालास्सेरी दंगे और हत्याएं भी भुलाए नहीं भूलते. सीपीएम ने कथित तौर पर कन्नूर में आरएसएस स्वयंसेवक वदिक्कल रामकृष्णन की हत्या कर दी.  जिससे हिंसा का एक चक्र शुरू हो गया; इसके अलावा पोनकुन्नम और पलक्कड़ में भी घटनाएं हुईं. 1978-80 के बीज कन्नूर में काफी हिंसक झड़पें हुईं, कई हत्याओं का सिलसिला चला, जिनमें किशोर आरएसएस कार्यकर्ता चंद्रन (1978), एबीवीपी नेता गंगाधरन (1980) और अन्य शामिल थे; बम और हथकंडों का इस्तेमाल किया गया.  कन्नूर एक संवेदनशील केंद्र बन गया, जहां आरएसएस के 78 से अधिक लोगों की मौत हुई.

1984 में तो कई हमले हुए. सीपीएम ने कथित तौर पर पूर्व प्रचारक अय्यप्पन पर बम फेंका, आरएसएस नेता सदानंदन मास्टर के पैर काट दिए और एर्नाकुलम और त्रिशूर में कई लोगों की हत्या कर दी. आपातकाल के बाद हिंसा और भी तीव्र हो गई. सदानंदन तो इसके बाद पूरे देश भर में जाने पहचाने लगे. 1999 में पी. जयराजन पर हमले को लेकर संघ भी आरोपों के घेरे में आया. इस हमले में जयराजन ने अपना एक हाथ खो दिया था. इस घटना में दोनों पक्षों के सैकड़ों लोगों की जान गई और ये हिंसा अब भी थमी नहीं है, 2014 में भी मोदी सरकार बनने के बाद आरएसएस के स्वयंसेवक मनोज की चाकू मारकर हत्या कर दी गई. 2016 में प्रचारक अमल कृष्णा पर हमला हुआ और कन्नूर और तिरुवनंतपुरम में घरों पर हमले और मारपीट की घटनाएं सामने आईं. फर्क बस इतना आया है कि अब संघ के स्वयंसेवकों को ये लगने लगा है कि दबेंगे नहीं, डरेंगे नहीं और जरूरी लगा तो जवाब भी देंगे.
 
गुरुजी मानते थे कि बीफ का चलन आजादी के बाद ज्यादा बढ़ा, अंग्रेज अंकुश रखते थे

1967 में केरल के पलक्कड़ ज्ञानाश्रम के स्वामी पुरुषोत्तमनंदा के साथ गो-हत्या-विरोधी आंदोलन पर चर्चा करते हुए,  गुरू गोलवलकर ने दो बिंदुओं पर जोर दिया था, पहला यह था कि इस देश में गायों का वध केवल विदेशी शासन स्थापित होने के बाद ही शुरू हुआ. “इसलिए यह हमारे राष्ट्रीय जीवन पर एक गंभीर कलंक है. मुसलमानों ने इसे शुरू किया और अपने साम्राज्यों में इसे प्रथा बना दिया. अब हम स्वतंत्र हैं और हमारे कर्तव्य है कि हम पूर्व-स्वतंत्रता काल के सभी ऐसे कलंक हटा दें. यदि हम यह कर्तव्य नहीं निभाएंगे तो हम मानसिक गुलामी के शिकार हो जाएंगे. लेकिन स्वतंत्रता के बाद न केवल गायों का वध प्रतिबंधित नहीं हुआ, बल्कि यह कई गुना बढ़ गया. यहां तक कि 1944-45 में यह पहले से 50 से 100 प्रतिशत अधिक बढ़ गया था. यह संभवतः इसलिए हुआ क्योंकि ब्रिटिश काल के दौरान विदेशी सेनाएँ यहां तैनात थीं, लेकिन इसके बाद जब ये सेनाएँ चली गईं और हम स्वतंत्र हो गए, तो गायों का वध 20 गुना से भी अधिक बढ़ गया।”

गुरु गोलवलकर का दूसरा बिंदु यह था कि पूरे देश में गोहत्या पर रोक लगाने वाला एक केंद्रीय कानून अत्यंत आवश्यक है. इसके महत्व को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा, “हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि ब्रिटिशों ने सेना के लिए गोमांस और सुअर के मांस के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी. हमें यह भी याद रखना चाहिए कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के कारण क्या थे. अब सेना में सुअर का मांस प्रतिबंधित है, लेकिन गोमांस का स्वतंत्र रूप से उपयोग किया जा रहा है.
 
संघ की केरल पर पकड़ इतनी मजबूत पहले कभी नहीं रही

संघ 2024 तक 5142 शाखाएं केरल में शुरू कर चुका है. बेहतर प्रबंधन के लिए केरल को दो हिस्सों में संघ कार्य की दृष्टि से उसी तरह बांट दिया गया जैसे बाकी प्रांत बांटे गए थे. अब केरल उत्तर और केरल दक्षिण दो प्रांत हो गए हैं. जबकि 1964 तक केरल तमिलनाडु प्रांत का ही हिस्सा था. 2019 से लेकर अगले 5 सालों में ही शाखाओं में एक हजार से ज्यादा वृद्धि हैरान कर देने वाली है. ऐसी तेज वृद्धि पहले आपातकाल के दौरान देखी गई थी, जब करुणाकरण की सरकार थी और वामदल आपातकाल के समर्थन में थे, ऐसे में तमाम कम्युनिस्ट भी संघ के साथ आ गए थे. पहले बाहर से केरल में प्रचारक भेजे जाते थे, अब प्रज्ञा प्रवाह जैसे राष्ट्रीय वैचारिक संगठन केरल के जे नंदकुमार जैसे प्रचारकों के निर्देशन में चल रहे हैं.

पिछली कहानी: संघ के 100 साल: पूर्व हॉकी खिलाड़ी ने असम में बिछाया शाखाओं का जाल, पूर्वोत्तर क्यों था संघ के लिए कठिन

—- समाप्त —-



Source link
[ad_3]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *