आशा-लता से कहा जाता- शमशाद जैसे गाओ: पिता की शर्त पर ताउम्र बुर्खा पहनकर गाया, फोटो खिंचवाने की मनाही थी, किशोर कुमार उठाते थे इनकी कुर्सी
1931 की बात थी भारत-पाकिस्तान उन दिनों एक था और कोई सीमाएं-सरहद नहीं थी। लाहौर-बॉम्बे और कोलकाता में फिल्में बनना शुरू हो चुकी थीं, रेडियो का दौर भी आ चुका था और कुछ म्यूजिक कंपनियां गाने रिकॉर्ड कर बेचा करती थीं। लाहौर की जेनोफोन म्यूजिक कंपनी उन दिनों काफी मशहूर हुआ करती थी। एक दोपहर…